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Monday, November 24, 2025

अबकि बार फिर नितीश कुमार शपथ-ग्रहण

कर शपथ कर शपथ कर शपथ

शपथ-ग्रहण

20.11.2025 11.37 सुबह,पटना


लग्नेश/ग्रह-नक्षत्र-उपनक्षत्र : उपनक्षत्र का नक्षत्र

लग्न मकर : शनि-चंद्र-शुक्र : वृह.

ग्रह सूर्य : मंगल-शनि-शनि : वृह.

ग्रह चंद्र : मंगल-शनि-शनि : वृह.

ग्रह मंगल : मंगल-बुद्ध-बुद्ध : शनि

ग्रह बुद्ध : मंगल-शनि-शनि : वृह.

ग्रह वृह. : चंद्र-वृह.-मंगल : बुद्ध

ग्रह शुक्र : शुक्र-वृह.-शनि : वृह.

ग्रह शनि : वृह.-वृह.-मंगल : बुद्ध

ग्रह राहु : शनि-वृह.-वृह. : वृह.

ग्रह केतु : सूर्य-शुक्र-वृह. : वृह.

राशि एवं लग्न

२० नवंबर २०२५ को मार्गशीर्ष मास की अमावस्या तिथि को वृष्चिक राशि के अनुराधा नक्षत्र में शपथ-ग्रहण हुआ । वृष्चिक के स्वामी मंगल अनुराधा के स्वामी शनि हैँ । उस समय मकर लग्न श्रवण नक्षत्र में उदित हो रहा था । मकर के स्वामी शनि और श्रवण के स्वामी चंद्र हैँ । इस प्रकार राशि और लग्न में शनि, मंगल, चंद्र में शनि की प्रधानता है, जो वक्री हैँ; तथा तीसरे स्थान बनाम आयु स्थान में बैठे हैँ' अलबत्ता भाव में दूसरे बनाम धन, कुटुंब में बैठे शुभ हैँ । मंगल,चंद्र अस्त हैँ । इनकी विवेचना आगे की गई है ।

२० नवम्बर २०२५, 

मार्ग शीर्ष मास अमावस्या तिथि, 

मकर लग्न श्रवण नक्षत्र,

वृश्चिक राशि अनुराधा नक्षत्र;

मकर ( शनि ) श्रवण (  चंद्र ),

वृष्चिक ( मंगल ) अनुराधा ( शनि ); 

शनि वक्री, चंद्र और मंगल अस्त !

अबकी बार शपथ मकर लग्न वृश्चिक राशि शनि महादशा शनि अंतर्दशा में हो रहा है ।

अमावस्या दिवस

शपथ-ग्रहण अमावस्या के दिन हुआ था । इसलिए यह भी एक ध्यान देने योग्य बात है ।

ग्रह

 कुंडली मे चंद्र, बुद्ध, मंगल अस्त जबकि  बुद्ध, वृहस्पति, शनि वक्री हैँ ।

इनमे बुद्ध अस्त और वक्री दोनो हैँ ।

यह बात ध्यान देने योग्य दीगर है ।

 लग्न

शनि के लग्न पर राहु विराजमान हैँ । शनि दास एवं राहु मलेच्छ ग्रह हैँ । इसलिए सेवक के साथ तामसिक भोगी वृतियों का भी सरकार की प्रकृति में समावेश होगा ।

लग्न : केपी

 लग्न शनि राशि चंद्र नक्षत्र शुक्र उप-नक्षत्र में है तथा शुक्र वृहस्पति नक्षत्र में हैँ जो उच्च सह वक्री हैँ । 

शनि, चंद्र, वृह. सात्विक जबकि शुक्र तामसिक ग्रह हैँ । अलबत्ता चंद्र, वृह., शुक्र स्वाभाविक शुभ ग्रह हैँ । इस प्रकार सरकार में सतगुण का प्रभाव तमगुण से अधिक होगा ।

लग्न और केपी लग्न

चंद्र, वृह., शनि सत तो शुक्र, राहु तम को इंगित कर रहे हैँ । इस प्रकार सात्विक प्रवृति के साथ कुछ तामसिक गुणों के साथ सरकार चलेगी ।

चुंकि लग्न के उपनक्षत्र के नक्षत्र वृह. हैँ इसलिए सात्विकता की मात्रा इसका फाइनल परिणाम होगा ।

वृह. २, ३, ६, ७, १२ को दर्शा रहे हैँ और 6 में हैँ' ६ रोग ऋण रिपु मुकदमा का है इसलिए कई कारक चीजों के बीच विवाद भी होगा ।

भाव

भाव-कुंडली में शनि 2, राहु 1, वृहस्पति 6, केतु 7, सूर्य' चंद्र' मंगल' बुद्ध' शुक्र १० हैँ ।

केपी भाव

केपी भाव-कुंडली में शनि 2, राहु 1, वृहस्पति 6, केतु 7, सूर्य' चंद्र' बुद्ध, शुक्र 9 तथा मंगल 10 में स्थित हैँ ।

विश्लेषण

इस प्रकार भाव-कुंडली तथा केपी भाव-कुंडली में सूर्य चंद्र बुद्ध शुक्र की दशम या नवम स्थिति को लेकर भेद है, अपितु दोनो शुभ स्थान हैँ । लेकिन केवल शुभ स्थान होने से ग्रह शुभ फलदाई हो जाएँ जरूरी नहीं, उनका स्वयं भी उनके कारकत्व एवं स्थिति अनुसार शुभ होना अनिवार्य होता है । शुभ स्थान में होने से उनके शुभ होने का एडवांटेज अवश्य मिल जाता है । मगर फाइनल फलादेश के लिए और भी विवेचन करना अनिवार्य है ।

सूक्ष्म अध्ययन के लिए भाव के बाद केपी भाव की गणना की जाती है अथवा करनी चाहिए ।

विस्तृत सूक्ष्म विवेचन

वृह. सबसे अधिक बार और बारम्बार राशि, नक्षत्र, उपनक्षत्र, उपनक्षत्र का नक्षत्र सह दृष्टि आदि प्रभाव देते हुए स्पस्ट हैँ , इसलिए समस्त सरकार की आयु एवं स्थायित्व के साथ सभी दशा के फाइनल परिणाम देने वाले वृह. ही हैँ ।

लग्न

शनि - चंद्र - शुक्र - वृह.

महादशा - अंतर्दशा

शनि - शनि : २०.११.२०२५ - 20.०४.२०२८

शनि - बुद्ध : २०.०४.२०२८ - 29.१२.२०३०

शनि - केतु : २९.१२.२०३० - 08.०२.२०३२

महादशा के नक्षत्र और आगामी 5 बरस तक की अन्तरद्शा स्वामी के उप-नक्षत्र के नक्षत्र स्वामी वृहस्पति हैँ । वृहस्पति उच्च सह वक्री हैँ । यूं तो 3, १२ के स्वामी दिख रहे हैँ मगर एडवांस केपी कुंडली में वृहस्पति 2, 12 के स्वामी हैँ । इनमे 2 भाव में महाद शनि तो 12 में रिक्त स्थान है; इसलिए 1२ का प्रभाव अधिक आएगा । वृहस्पति स्वयं 7 में हैँ मगर भाव में 6 हैँ, इसलिए 6 का प्रभाव भी आएगा ।

2, 7 शुभ तो 6, 12 बाधा पैदा करने वाले माने जाते हैँ । 2 धन' कुटुंब, 7 साझेदारी' आयात-निर्यात, ६ रोग, ऋण, रिपु विवाद मुकदमा, 12 व्यय' अस्पताल' समस्या के कारक हैँ । वृह इन सबसे जुड़े हैँ । इसलिए इन सबका फल देंगे । मगर अपनी प्रकृति अनुसार । क्योंकि ग्रह फलादेश के मापदंड को पुरा करते हैँ मगर अपने स्वभाव और प्रकृति अनुसार ।

 वृह. की प्रकृति सौम्य है । लीगल है । ऑथेंटिक है । इसलिए सबकुछ लाभ एवं विरोध वगैरह सौम्य तरीके से होगा । यद्यपि फल वही होगा जो ज्योतिष के नियम कहते हैँ' जो ऊपर कहे गये हैँ । 

सरकार में आर्थिक योग्यता, कटुंब-भाव होगा मगर साझेदारी की अच्छी स्थिति के बाद भी राशिगत समानता के कारण सहभागिता के बावजूद नीच के चन्द्रमा के कारण मतांतर होगा, समस्या होगी । विवाद-मुकदमा होगा ।

 वृह. गुरु कहे गए हैँ क्योंकि वृह. गुरु और धर्म के कारक हैँ; वृह. भाव में 6 हैँ इसलिए शैक्षिक और धार्मिक मामलों पर कंट्रोवर्सी मतांतर होगा । शिक्षक एवं शिक्षण मामलों में विवाद की आशंका है । इसमे शिक्षकों की मांग से लेकर प्रश्न पत्र लीक या अन्यांय कोई भी शिक्षा या शिक्षण सम्बन्धी कारण होंगे । अगर ये कारण ना हुआ तब भी शिक्षक या शिक्षण संस्थान से आमना सामना टकराव के आसार दीखते हैँ ।

बाधक स्थान

स्थिर लग्न के लिए नवम भाव, चर लग्न के लिए एकादश भाव, द्विस्वभाव लग्न के लिए सप्तम भाव बाधक स्थान बनाम बाधाकारक होते हैँ । जबकि आमतौर पर यह तीनो स्थान ही 7, 9, 11 कुंडली के कारक स्थान माने जाते हैँ, मगर लग्न की स्थिर चर द्विस्वभाव प्रकृति अनुसार इनकी स्थिति फलादेश में अतिरिक्त फलादेश अथवा अंतर पैदा होता है । बाधक स्थान मारकेश प्रभाव रखते हैँ, और यह केपी कुंडली में भी मान्य है । इसलिए तमाम फलादेश के बावजूद इनकी इस फलादेश को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ।

एकादश में ग्रह बाधाकारक हैँ मगर राहत की बात यह है की इनमे किसी की महादशा नहीं चल रही है । हां ! आगामी अंतर्दशा में बुद्ध की अंतर्दशा अवश्य चलनेवाली है । यह बाधक प्रभाव देंगे । महादशा चुंकि शनि की है अतः एकादश् में बैठे इन चार ग्रह सूर्य, मंगल, बुद्ध, शुक्र के कारण मारक बाधा नहीं होगी । मगर बाधामय स्थिति होगी । बुद्ध अंतर्दशा में अल्लायंस या उनके लोग या पार्टी से मतभेद विवाद होगा । इनसे मतभेद होगा । बुद्ध के स्वाभाविक वाणिज्यकारक होने तथा 6 ऋण भाव स्वामी होने से व कारण आर्थिक और नवम भाव स्वामी होने से धार्मिक मसले पर विवाद मतभेद होगा । चंद्र नीच होने से मतांतर पैदा करता है, एकादश में नीच होने से मैत्री में मतभेद या मतांतर दर्शाता है । क्योंकि चन्द्रमा मन कारक है । एवं सप्तम स्वामी होकर नीच होने से साझेदारी में समस्या को दर्शाता है । ऐसा हो सकता है घटक दल मे कोई या कुछ हट जाएँ या हटा दिये जाएँ । सूर्य के कारण शासकीय नीतियों से नाराजगी भी एक बड़ी वजह हो सकती है । सूर्य अस्टम अर्थात सप्तम के द्वितीय मतलब सरकार के साझेदार की किसी मौखिक वानी आदि के कारण मैत्री संबंधों में विवाद होगा । क्योंकि सूर्य एकाद्श अर्थात मैत्री स्थान में हैँ । मुख्य पार्टी की किसी नीति से रुस्त होकर विषमता की स्थिति बनेगी । मंगल के कारण भूमि, ठेकेदारी से रिलेटेड प्रसंग भी उठेंगे । मगर इन चारों सूर्य, मंगल, बुद्ध, शुक्र में आगामी दशा बुद्ध की अंतर्दशा है । इसलिए सर्वाधिक कारण बुद्ध का ही लक्षित होगा । इसलिए मसला आर्थिक-व्यापारिक नीतियो और धार्मिक, जातीय विवाद या नियमावली वगैरह का होगा । 

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 इसलिए इस प्रकार मिश्रित फल मिलेगा ।

साझेदारी में मतविभिन्नता या मतविविधता ।

राशि

बीजेपी, मोदी,नितीश इन तीनों की वृश्चिक राशि है; शपथ ग्रहण के दिन भी वृश्चिक राशि ही थी । शायद संयोग से अथवा ज्योतिषीय आधार पर ऐसा किया गया हो । एक हद तक ठीक भी है । क्योंकि तीनो की समान राशि होने के कारण ही इनकी आपस में बनती भी है ।

मगर केवल राशि समान होने से सबकुछ आसान हो जरूरी नहीं, इसके लिए कई अन्य बातों का भी ध्यान रखना होता है । इसलिए कई विषमताओं के बाद स्थिति सुधरेगी ।

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लग्न पर राहु शनि प्रभाव है ।

लग्न पर वृहस्पति की दृस्टि है ।

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महादशा सह अंतर्दशा

महादशा के नक्षत्र एवं अंतर्दशा के तमाम उप-नक्षत्र के नक्षत्र स्वामी वृहस्पति हैँ । वृहस्पति उच्च सह वक्री हैँ । यूं तो 3, १२ के स्वामी दिख रहे हैँ मगर एडवांस केपी कुंडली में वृहस्पति 2, 12 के स्वामी हैँ । इनमे 2 भाव में शनि तो 12 में रिक्त स्थान है; इसलिए 1२ का प्रभाव अधिक आएगा । वृहस्पति स्वयं 7 में हैँ मगर भाव में 6 हैँ, इसलिए 6 का प्रभाव भी आएगा ।

:: फलादेश विशेष ::

: दशा विशेष :

शनि - शनि

शनि - बुद्ध

शनि - केतु

शनि : नक्षत्र वृहस्पति उपनक्षत्र मंगल उपनक्षत्र का नक्षत्र बुद्ध

बुद्ध : नक्षत्र शनि उपनक्षत्र शनि उपनक्षत्र का नक्षत्र वृहस्पति

केतु : नक्षत्र शुक्र उपनक्षत्र वृहस्पति उपनक्षत्र का नक्षत्र वृहस्पति

लग्न : नक्षत्र चंद्र उपनक्षत्र शुक्र उपनक्षत्र का नक्षत्र वृहस्पति 

शनि, बुद्ध, केतु के उपनक्षत्र के नक्षत्र स्वामी वृहस्पति हैँ ।

लग्न के उपनक्षत्र के नक्षत्र स्वामी वृहस्पति हैँ ।

इस प्रकार वृहस्पति स्पष्ट रूप से ना सिर्फ लग्न के स्तर पर बल्कि सम्पूर्ण दशा के स्तर पर अपना फल दे रहे हैँ ।

ज्ञात हो कि सूक्ष्म-गणना बनाम एडवांस मेथड में राशि या ग्रह अथवा राशि या ग्रह के नक्षत्र जहां फलादेश में कारक भूमिका निभाते हैँ तो राशि या ग्रह के उपनक्षत्र और उपनक्षत्र का नक्षत्र स्वामी फलादेश में निर्णायक भूमिका निभाते हैँ । अगर राशि या ग्रह के उपनक्षत्र स्वामी के नक्षत्र में कोई ग्रह ना हो तो उपनक्षत्र स्वामी ही ग्रह की निर्णायक भूमिका करता है; अथवा उपनक्षत्र स्वामी के नक्षत्र में कोई ग्रह हो तो उपनक्षत्र का नक्षत्र स्वामी ग्रह का निर्णायक फल स्पस्ट करता है ।

इसमे एक बात और ध्यान देने लायक़ है कि अगर उपनक्षत्र स्वामी स्वनक्षत्र में है तो उपनक्षत्र स्वामी ही ग्रह की निर्णायक भूमिका निभाता है ।

आत्मकारक एवं अमात्यकारक

शुक्र आत्मकारक होकर दशम में स्वराशी होकर मालव्य योग का निर्माण कर रहे हैँ ।

मंगल अमात्यकारक होकर एकादश में स्वागृही हैँ यद्यपि अस्त प्रभाव भी है ।

इनकी 10, 11 स्थिती इनके सबल स्थति को दर्शा रहा है । ल

पंचमहापुरुष : हंस और मालव्य

शपथ-ग्रहण कुंडली में पंच महापुरुष योग में से दो योग हंस और मालव्य योग कुंडली में मौजूद हैँ । मंगल, बुद्ध, वृहस्पति, शुक्र, शनि केंद्र अर्थात 1, 5, 7, 10 स्थान में स्वराशि या उच्च राशि में स्थित हों तो पंचमहापुरुष योग का निर्माण होता है । मंगल से रूचक, बुद्ध से भद्र, वृहस्पति से हंस, शुक्र से मालव्य, शनि से शश पंचमहापुरुष योग का निर्माण होता है । वृहस्पति केंद्र में 7 तथा शुक्र केंद्र में 10 में बैठकर मालव्य योग का निर्माण कर रहे हैँ । यद्यपि भाव मे वृहस्पति 6 तथा केपी भाव में वृहस्पति 6, शुक्र 9 होकर पंचमहापुरुष योग को अपेक्षाकृत कमजोर कर रहे हैँ । फिर भी यह मात्र पंच महापुरुष मामले में ऐसा करेंगे, इससे इस योग के दोनो ग्रह वृहस्पति, शुक्र के अनय फलों में कोई कमी नहीं आएगी । वो अन्य मामलों मैं ज्योतिषीय नियमों के अनुसार समान रूप से अपने बल आदि अनुसार अपना फल देते रहेंगे ।

हंस योग चुंकि सप्तम में उच्च वृहस्पति वक्री द्वारा बना है इसलिए उच्च बौद्धिक क्षमता, राष्ट्रवादी, धर्म परायन लोगो का सहयोग एवं साझेदारी मिलेगी । 

मालव्य योग चुंकि दशम में स्वगृही शुक्र द्वारा बना है इसलिए कर्म-क्षेत्र में विशेषतः परिवहन, मनोरंजन, शिक्षा, कंस्ट्रक्शन, बीज, मैन्युफैक्चरिंग आदि के कार्याँव्यन में अधिक और अच्छी सफलता मिलेगी ।

राशि एवं लग्न समानता

संयोग या प्रयोग

बीजेपी, नीतिश, शपथ-ग्रहण की कुंडली तीनो ही वृश्चिक राशि हैँ; और तो और बीजेपी और नीतिश  जी का लग्न तक समान है, मिथुन लग्न !

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सारांश 

राशिगत समानता के कारण बीजेपी, मोदी, नितीश कॉम्बिनेशन फलीभूत होगा । लग्न-स्थिति के कारण धन, संचार, लोन-क्षेत्र में प्रोग्रेस के बाद भी शैक्षिक, जातीय, धार्मिक मतभेद उभरेंगे; मगर लॉफुल मीनिंग में जारी रहेंगे अथवा सुलझा लिए जाएंगे । सप्तम और सप्तमेश के कारण साझेदारी में अच्छे समर्थन के बाद एवं बावजूद साझेदारी और मैत्री-संबंधों में मतभेद उभरेगा । अष्टम सूर्य एकादश में मैत्री भाव के स्वामी एकादशेष स्वगृही मंगल के साथ एकादश में बैठे सप्तम स्थान बनाम साझेदार स्थान' विवाह स्थान के स्वामी चंद्र जो पहले से ही नीच राशि में निर्बल हैँ के साथ भाग्य-स्थान् सह उच्च शिक्षा भाव स्वामी बुद्ध बनाम व्यापारिक लोग, काउंट्रेक्टर आदि को मैत्री-भाव बनाम एकादश भाव में अस्त कर रहे हैँ; इसलिए किसी सरकारी आदेश से मित्र-मंडली, साझेदारों, व्यापारिक आदि मित्रों आदि में मतभेद या असंतोष को दर्शा रहे हैँ । एकादश की ग्रह और भाव-स्थिति के कारण कई कारक कार्य के बीच व्यापार, अर्थ, धार्मिक-जातीय नियम कानून, जल, बाल, स्त्री, भूमि, ट्रांसपोर्ट जैसे कारणों से मतभेद पैदा करेंगे । इस प्रकार कार्यकारी सरकार होने के बावजूद कई प्रकार की वैचारिक असमानता से साथी, सहयोगी, साझेदार, मित्र, परीचित आदि से असंतोष, मनमुटाव वगैरह किसी मसले आदि पर इसके दशाफल होंगे । यद्यपि सारी गतिविधियाँ अहिंसक, विरोध-प्रदर्शन तक सीमित होंगी, हिंसक मोड़ नहीं लेंगी । भले सरकार अल्लायंस में मतविभिन्नता और वैचारिक असमानता किसी स्तर तक हो जाये । अर्थ यह हुआ कि समान वैचारिक गठबंधन युति की सरकार दशा प्रभाव से सामयिक स्तर पर विविध वैचारिक मतभेद से गुजरेगी । अपितु कोई भी मसला हिंसक नहीं होगा, बात ध्यान देने योग्य है । 

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